Saturday, 21 April 2012

खो गये हमसे जो थे जान से प्यारे सपने.....

खो गये हमसे जो थे जान से प्यारे सपने,
अब तो सच हो न सकेंगे वो हमारे सपने।
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जलती आँखों में नमी दे गये ये क्या कम है,
बनके आँखों से गिरे आब के धारे सपने।
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पसे जिनदाने नज़र कैद रहे हैं बरसों,
बड़े मायूस ये हालात के मारे सपने।
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बन के किरचे यूँ चुभे आंख में ये अब मेरी,
खून के अश्क रुलाते हैं ये सारे सपने।
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कभी चमके थे उम्मीदों के जो सूरज बनकर,
अब तो टूटे हैं बिखरते हैं बेचारे सपने।

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